ॐ अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥ (यह ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध मंत्र है)
यहाँ "ॐ अग्न आ याहि वीतये..." ऋग्वेद के इस प्रसिद्ध मंत्र के बारे में 10 पंक्तियों में सभी आवश्यक जानकारी दी गई है:
1. **मंत्र एवं शब्दार्थ:** "ॐ अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥" इसमें **अग्न**=हे अग्निदेव, **आ याहि**=आइए, **वीतये**=यज्ञ में भाग लेने के लिए, **गृणानो**=हमारे स्तुति मंत्रों को सुनकर, **हव्यदातये**=हव्य (आहुति) ग्रहण करने के लिए, **नि सत्सि**=विराजिए, **होता**=हवन करने वाले के रूप में, **बर्हिषि**=यज्ञ की कुशा (बिछी हुई घास) पर।
2. **पूरा अर्थ:** हे अग्निदेव! आप हमारी स्तुतियों को सुनकर यज्ञ में भाग लेने और आहुति ग्रहण करने के लिए पधारें। आप होता (यज्ञ कराने वाले) के रूप में यज्ञ की बिछी हुई कुशा (बर्हि) पर विराजमान हों।
3. **प्रथम शक्ति - देवताओं का आह्वान:** यह मंत्र अग्निदेव को साक्षात् आमंत्रित करने की शक्ति रखता है। इसके उच्चारण मात्र से यज्ञ-हवन में अग्नि प्रसन्न होती हैं।
4. **द्वितीय शक्ति - कर्मकांडों की सिद्धि:** यज्ञ या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत में इस मंत्र के जाप से सारे कर्म बिना किसी विघ्न के सिद्ध हो जाते हैं।
5. **तृतीय शक्ति - आध्यात्मिक उन्नति:** यह मंत्र जीवन में दिव्य चेतना का आह्वान करता है। इसके जाप से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है और वह सात्विक विचारों से ओत-प्रोत होता है।
6. **कौन कर सकता है जाप:** यह मंत्र मुख्यतः उन लोगों के लिए है जो कोई धार्मिक अनुष्ठान, हवन या यज्ञ कर रहे हों। सामान्य जीवन में भी कोई भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इसका जाप कर सकता है।
7. **जाप का आदर्श समय:** यज्ञ या हवन के समय तो यह मंत्र अवश्य बोला जाता है। दैनिक जीवन में प्रातःकाल (सूर्योदय से पूर्व) स्नान आदि से निवृत्त होकर इसका जाप करना चाहिए।
8. **विशेष दिन एवं अवसर:** किसी भी शुभ कार्य, यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह या गृह प्रवेश के अवसर पर इस मंत्र का उच्चारण करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
9. **जाप विधि:** किसी स्वच्छ स्थान पर पवित्र होकर बैठें। घी का दीपक जलाएं और अग्निदेव का ध्यान करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें। यदि हवन कर रहे हैं तो आहुति देते समय इस मंत्र को बोलें।
10. **लाभ:** इस मंत्र के जाप से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, कार्यों में सफलता मिलती है और मन को शांति मिलती है। यज्ञ करने से वातावरण भी शुद्ध होता है।
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